होरी-माधुरी · पद 25
हट खोलो न, घुँघट पट, ओ नटखट।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: haṭa kholo na, ghuṁghaṭa paṭa, o naṭakhaṭa!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हट खोलो न, घुँघट पट, ओ नटखट।
2आगे ननद, सास है पाछे, अबहिं होयगी झट खटपट।
3जाय कहेगी मम गूजर सोँ, लै आवे सो लठ झटपट।
4दुइ दिन भये ब्याहु कहँ मो कहँ, अबहिं जायगो पिट चटपट।
5चखिहौं मजा फाग को अबहीं, भूलि जायगी चट सटपट।
6यह “कृपालु” गोलोक नाहिं यह, माया लोक निपट अटपट॥
हिन्दी भावार्थ
होली के अवसर पर उलझते हुए श्यामसुन्दर को डाँटती हुई एक सखी कहती है कि अरे ओ नटखट श्यामसुन्दर! हट जाओ! मेरे घूँघट के वस्त्र को न खोलो! देखो मेरी ननद आगे जा रही है एवं मेरी सास पीछे आ रही है। यदि वे सब देख लेंगी तो अभी झगड़ा बढ़ जायेगा। इसके अतिरिक्त वे लोग जाकर मेरे पति से कहेंगी, वह तुरन्त ही लठ लेकर आ जायेगा और तुम अभी ही होली का मज़ा चख जाओगे क्योंकि मेरे विवाह को अभी दो दिन ही हुए हैं। पिटने पर तुम्हारी सब सिट्टी पिट्टी भूल जायेगी। 'कृपालु' कहते हैं कि यह ठीक है कि तुम सभी जीवों के परमपति हो किन्तु यह अत्यन्त ही विचित्र मायालोक है, गोलोक नहीं है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 702