होरी-माधुरी · पद 24
सखी! सब, ह्वै गये लालहिं लाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! saba, hvai gaye lālahiṁ lāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! सब, ह्वै गये लालहिं लाल।
2ऐसो रंग चल्यो पिचकारिन, ऐसो उड़्यो गुलाल।
3लाली लाल, लाल भये लालहुँ, लाल भई ब्रजबाल।
4तरुवर लाल, लाल भये सरवर, शुक, पिक लाल मराल।
5धेनु लाल ब्रजरेनु लाल भइ, लाल भये सब ग्वाल।
6बाहर लाल “कृपालु” फाग को, भीतर लाल गुपाल॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी वृन्दावन की होली के दृश्य का वर्णन करती हुई अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी! युगल सरकार की होली में पिचकारियों से ऐसा रंग चला और ऐसा गुलाल उड़ा कि जड़ चेतन सब लाल हो गये। श्यामसुन्दर लाल हो गये, किशोरी जी भी लाल हो गयीं और ब्रजबालाएँ भी लाल हो गयीं तथा समस्त वृक्ष और सरोवर भी लाल हो गये। तोते, कोयल एवं हंस आदि भी लाल हो गये। समस्त गायें एवं ब्रज की धूलि भी लाल हो गयीं एवं समस्त ग्वाल बाल भी लाल हो गये। 'कृपालु' कहते हैं कि बाहर तो फाग सम्बन्धौ गुलाल आदि के रंग से लाल हो उठे हैं एवं आंतरिक रूप से सब लोग श्यामसुन्दर के अनुराग में रंजित हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 701