होरी-माधुरी · पद 23
वृंदावन, धूम मची होरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: vṛindāvana, dhūma machī horī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1वृंदावन, धूम मची होरी।
2सखन सखिन को, सखिन सखन को, लै पिचकारिन रँग बोरी।
3लली लाल मंडल बिच ठाढ़े, दुहुँन, दुहुँन किय सरबोरी।
4लाल गुलाल लाल भये बादर, लाल लाल भइ ब्रजखोरी।
5स्त्रस्त व्यस्त सब के पटभूषन, करत परस्पर झकझोरी।
6तब “कृपालु” कह, साँझ भई अब, कालि होय होरी हो री॥
हिन्दी भावार्थ
वृन्दावन में होली की, धूम मची हुई है। सखाओं ने सखियों को और सखियों ने सखाओं को रंगभरी पिचकारी मार-मार कर रंग में सराबोर कर दिया है। श्यामा-श्याम मण्डल के बीच में खड़े हुए खेल रहे हैं। इन दोनों ने भी एक दूसरे को रंग में सराबोर कर दिया है। लाल-लाल गुलाल इतना अधिक है कि उससे बादल भी लाल हो गये हैं और ब्रज की समस्त गलियाँ भी लाल हो गयी हैं। सखाओं एवं सखियों के दल में परस्पर इतनी झकझोरा-झकझोरी हुई कि सभी के वस्त्र एवं आभूषण अंडबंड हो गये। तब 'कृपालु' ने कहा कि अब सायंकाल हो गया है। आज खेल समाप्त किया जाय। कल फिर यहीं पर, इसी प्रकार होली खेली जायेगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 700-701