होरी-माधुरी · पद 22
लाल सँग, खेलिय हिल मिल फाग।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lāla saṁga, kheliya hilamila phāga
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लाल सँग, खेलिय हिल मिल फाग।
2चलु री सखी! भव-निशा सिरानी, भई भोर गइ जाग।
3केशर घोर भाव की गोरी!, पिचकारी अनुराग।
4पानि तानि मारिय दृग-बानन, सहज पिया-रस-पाग।
5रति-रस-रँग-सरबोरी गोरी, लखु अपुनो बड़भाग।
6इमि “कृपालु” करि उर-पट-बंदी, करु निज अमर सुहाग॥
हिन्दी भावार्थ
(जीवरूपी सखी को ब्रह्म श्यामसुन्दर के साथ प्रेम अरी जीव-रूपी सखी! अब तो तेरी मायारूपी रात्रि बीत चुकी है एवं प्रात:काल हो चुका है तथा तू जाग भी गई है। अतएव चल! श्यामसुन्दर के साथ दिव्य होली खेल आवें। देख सखी! भाव रूपी केशर के रंग को अनुराग-रूपी पिचकारी में भरकर आँखों के कटाक्षरूपी हाथ से प्रियतम श्यामसुन्दर पर फेंकती हुई सहज ही प्रियतम के प्रेम में विभोर हो। एवं उनके द्वारा भी रति-रस के रंग में सराबोर होकर परम भाग्यशालिनी बन जा। 'कृपालु' कहते हैं कि इस प्रकार श्यामसुन्दर को अपने हृदय में.बंदी (कैदी) बनाकर सदा के लिए अपना सुहाग अमर कर ले।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 699-700