होरी-माधुरी · पद 21
लाल भये, लाल-गुलालन लाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lāla bhaye, lāla-gulālana lāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लाल भये, लाल-गुलालन लाल।
2भरि झोरिन गोरिन खोरिन इत, रोरिन होरिन डाल।
3बाल लाल भये, भाल लाल भये, लाल-लाल भये गाल।
4गुंजमाल मणि-माल लाल भई, लाल भई वनमाल।
5दुपटिहुँ लाल, लाल भइ लकुटिहुँ, भृकुटिहुँ लाल गुलाल।
6लालहिं लाल “कृपालु” लाल लखि, देत ताल ब्रजबाल॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखी! लाल-लाल गुलालों के द्वारा लालजी का शरीर लाल हो गया है। अरी सखी! आज कुंज गली में इकट्ठी होकर झोली भर-भर कर गुलाल लेकर ब्रजगोपियों ने इतना गुलाल फेंका कि श्यामसुन्दर के बाल, भाल एवं गाल सब लाल-लाल हो गये। गुंजमाला, मणिमाला एवं वनमाला भी लाल-लाल हो गयीं। श्यामसुन्दर की दुपटी, लकुटी एवं भूकुटी भी लाल-लाल हो गयीं। 'कृपालु' कहते हैं नन्दलाल को लाल गुलाल द्वारा इस प्रकार लाल-लाल देखकर ब्रजबाल-मण्डली ने करताल बजाते हुए अपने निहाल होने का परिचय दिया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 699