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RADHEY RADHEY

होरी-माधुरी · पद 20

लला! यह, भला कौन सोँ फाग।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lalā! yaha, bhalā kauna so phāga

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1लला! यह, भला कौन सोँ फाग।

2धींगामुश्ती करत लरत जनु, धन्य फाग अनुराग।

3जैसेहिं लली चली खेलन कहँ, जात गली महँ भाग।

4महापुरुष तोहिं परमपुरुष कह, नाम लगावत दाग।

5"हा, हा, हू, हू,"करन जान बस, तान, अलाप न राग।

6राजहंस की गति “कृपालु” किमि, जानि सकै कोउ काग॥

हिन्दी भावार्थ

होली खेलते समय श्यामसुन्दर को फटकारती हुई एक सखी कहती है कि अरे छलिया! तुझको होली खेलना आता भी है? धींगामुश्ती ही करना जानते हो, जैसे झगड़ा कर रहे हो। यही फाग का तरीका है? साहस यह है कि जैसे ही किशोरी जी होली खेलने चलती हैं, वैसे ही गली में भागते हुए दिखाई पड्ते हो। महात्मा लोग तुम्हें परमपुरुष अर्थात् भगवान् कहते हैं किन्तु तुम उस परमपुरुष नाम को कलंकित करते हो। इसके अतिरिक्त गायन सम्बन्धी राग एवं आलाप आदि तो कुछ जानते नहीं केवल हा हा हू हू करना जानते हो। कृपालु'भी व्यंग्य भरे शब्दों में कहता है कि अरी सखी! राजहंस की चाल को भला कौआ कैसे जान सकता है?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 698