होरी-माधुरी · पद 19
राधे सँग, श्याम खेलैं होरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: rādhe saṁga, shyāma khelaiṁ horī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1राधे सँग, श्याम खेलैं होरी।
2इत अगनित सखियन सँग राधे, उतै सखन श्यामहुँ जोरी।
3फाग-समर-आँगन वृंदावन, भिरे दोउ दल झकझोरी।
4लालहिं-लाल-गुलाल लाल भये, लाल, लाल भइ ब्रज खोरी।
5लै पिचकारिन मार परस्पर, रंग बिरंग रंग घोरी।
6केशर-रंगभरी लै गागरि, नागरि, नागर-सर ढोरी।
7औचक अवसर लखि रँगदेवी, लालहिं गाल रँगी रोरी।
8हारे सखन संग हरि इत, उत, जय जयकार लली को री।
9सखि-परिकर कर पकरि बांधि हरि, कह्यो करहु अब बरजोरी।
10करि सोरह श्रृंगार लाल को, दियो बनाय सुघर गोरी।
11दै “कृपालु” कर ताल अलिन सँग, हँसत कहत हो!हो!होरी॥
हिन्दी भावार्थ
राधा कृष्ण परस्पर होली खेल रहे हैं। इधर राधिकाजी के साथ असंख्य सखियाँ हैं एवं उधर श्यामसुन्दर के साथ भी असंख्यों सखा हैं। वृन्दावन रणक्षेत्र बना हुआ है एवं वहीं दोनों सेनाओं का होली युद्ध आरम्भ हो गया है। लाल-लाल गुलालों से श्री श्यामसुन्दर भी लाल हो गये हैं एवं ब्रज की गली-गली में लालिमा छा गयी है। पिचकारियों को ले-लेकर दोनों दल एक-दूसरे पर रंग-बिरंगे रंगों को घोलकर मार रहे हैं। इतने में ही किशोरी जी ने एक केशर के रंग से भरा हुआ घड़ा लेकर सहसा श्यामसुन्दर के सिर पर ढुलका दिया। अचानक ही इसी समय मौका पाकर रंगदेवी सखी ने श्यामसुन्दर के गाल में बुरी तरह गुलाल मल दिया। सखाओं के साथ श्रीकृष्ण दल हार गया। सखा लोग भाग खड़े हुए एवं लाड़लीजी की जय जयकार होने लगी। भागते हुए श्रीकृष्ण को सखियों ने पकड़ एवं बाँधकर कहा कि तुम सदा ही हम लोगों को तंग करते रहते हो, आज सब कसर निकाल लेंगी। फिर सखियों ने श्यामसुन्दर का सोलहों सिंगार करके सुन्दर नायिका बना दिया। कृपालु' कहते हैं कि सब सखियों के साथ हम ताली बजा बजाकर हँसने लगे और कहा, "होरी है! होरी है!
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 697-698