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RADHEY RADHEY

होरी-माधुरी · पद 18

रँग डारो री, वीर! मुरली वारो।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: raṁga ḍāro rī, vīra! muralī-vāro

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1रँग डारो री, वीर! मुरली वारो।

2हौं पनघट घट भरन गई रहि, आयो झूमत मतवारो।

3काँधे पट-लिपटी-पिचकारी, हौं जानी लकुटी धारो।

4जब हौं घट भरि चली डगर तब, लँगर रंग तकि उर मारो।

5पकरन भजी पकरि नहिं पायो, भाजि गयो कुंजनि कारो।

6कह “कृपालु” सखि! जल ही को घट, क्योँ नहिं वा सिर पर डारो॥

हिन्दी भावार्थ

एक सखी श्यामसुन्दर के द्वारा रंग में सराबोर किये जाने पर कहती है-''अरी सखी! मुरली वाले ने आज मुझे रंग में डुबो दिया। मैं पनघट पर पानी भरने गयी थी, वहीं पर अचानक झूमता हुआ वह मतवाला नन्द का लाला आ गया। उसने अपने कन्धे पर दुपट्टे से लिपटी हुई पिचकारी रखी हुई थी। मैंने सदा की भाँति पिचकारी को लठिया समझा। जब मैं घड़ा भरकर अपने घर चली तब मार्ग में आकर अचानक उसने मेरे हृदय में पिचकारी द्वारा रंग मार दिया। जब तक मैंने घड़े को नीचे रखा और पकड़ने को भागी, तब तक वह नटखट लताकुँज में भाग गया। इतने में 'कृपालु' ने कहा, ''अरी सखी! तूने जल का भरा हुआ घड़ा ही उसके सिर पर क्यों नहीं डाल दिया। होली में तो सब चलता है!''

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 696