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RADHEY RADHEY

होरी-माधुरी · पद 17

रँग डारो न, लँगर नइ सारी रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: raṁga ḍāro na, laṁgara nai sārī re!

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1रँग डारो न, लँगर नइ सारी रे।

2लेइ निकारि तोरि ठकुराई, हौं जाकी घरवारी रे।

3देइ निकारि सास मोहिं घर ते, घर न राख महतारी रे।

4बात फैलि जैहैं दिन द्वै में, सब हँसिहैं दै तारी रे।

5नित नइ चरचा होय तिहारी, तकत रहत परनारी रे।

6तब “कृपालु” खुलि जाय भेद सब, हम दोउन की यारी रे॥

हिन्दी भावार्थ

होली के अवसर पर श्यामसुन्दर को रंग डालने के लिये मना करती हुई एक सखी कहती है कि हे नटखट! मैं नयी साड़ी पहने हूँ, इसलिये इस पर रंग न छोड़ो। मैं जिसकी स्त्री हूँ बड़े तेज मिजाज का है। तुम्हारी सब ठकुराई निकाल लेगा। इसके अतिरिक्त मेरी सास मुझे घर से निकाल देगी एवं माँ भी अपने घर में नहीं रखेगी। यह बात दो दिन में सारे ब्रज में फैल जायेगी और सब लोग मेरी ओर देख-देख कर ताली म उड़ा करती हैं कि तुम सदा पराई स्त्रियों पर कुदृष्टि डालते हो। 'कृपालु' कहते हैं कि तब हम दोनों के परस्पर के गुप्त प्रेम का भण्डाफोड़ हो जायगा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 695-696