होरी-माधुरी · पद 16
रँग डारो न, कान्ह! दउँगी गारी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: raṁga ḍāro na, kānha! dauṁgī gārī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रँग डारो न, कान्ह! दउँगी गारी।
2सास, ननद सब नाम धरेंगी, तू न जान हम पर-नारी।
3छाँड़ु गैल, लखु सखियन देखति, कहहुँ जोरि कर बनवारी।
4जगत-प्रपंच न जानत रंचक, यह गोलोक न गिरिधारी।
5अहौ श्याम बदनाम सुनै जो, मम गूजर कर लठमारी।
6इमि “कृपालु” कहि झपटि अचानक, छोरि लई कर पिचकारी॥
हिन्दी भावार्थ
होली के अवसर पर श्यामसुन्दर रंग भरी पिचकारी लिये खड़े हैं। एक सखी उनको रोकती हुई कहती है कि हे श्यामसुन्दर! मेरे ऊपर रंग न छोड़ो, नहीं तो मैं गाली दूँगी। तुम नहीं जानते मैं विवाहिता स्त्री हूँ। अतएव मेरी सास एवं ननद रही हूँ। देखो! सब सखियाँ देख रही हैं। तुम इस मायिक जगत् के प्रपंच को बिल्कुल नहीं जानते। यह गोलोक नहीं है। फिर श्यामसुन्दर! तुम ब्रज में बहुत बदनाम भी हो। यदि कहीं मेरे पति ने सुन लिया तो वह सीधे आकर तुम्हें लट्ट मार देगा। कृपालु' कहते हैं कि इस प्रकार उस चालाक सखी ने बातें करते-करते ही धोखा देकर अचानक ही श्यामसुन्दर के हाथ से रंग भरी पिचकारी छीन ली। तत्पश्चात् क्या हुआ होगा पाठक स्वयं सोचें।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 694-695