# हट लिपट न, निपट यमुन-तट पै।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0747-M18-K026
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: होरी-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 26
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 351–351

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हट लिपट न, निपट यमुन-तट पै।  
<a id="line-2"></a>तजु चंचल अंचल-पट लखु सखि, लखति दृगंचल पनघट पै।  
<a id="line-3"></a>वा दिन बाँह मरोरि मोरि दिय, फोरि मारि लकुटी घट पै।  
<a id="line-4"></a>करि बरजोरी मुख मलि रोरी, तोरी लर वंशीवट पै।  
<a id="line-5"></a>करत रीत अनरीत मीत! कत?, लगत कलंक प्रीत-पट पै।  
<a id="line-6"></a>धनि “कृपालु” यारी सँग गारी, धनि-धनि वारी लंपट पै॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

होली के दिनों में नन्दकुमार के नटखट व्यवहार से तंग आकर एक सखी उनसे कहती है-''अरे निर्लज्ज! हरो यमुना के किनारे मुझ से न लिपटो। अरे चंचल! मेरा आंचल छोड़ दो। देखो! पनघट पर खड़ी सखियाँ तिरछी दृष्टि से देख रही हैं। तुमने उस दिन बरबस मेरी कलाई मोड़ दी और लठिया मार कर घड़ा फोड़ दिया। एक दिन वंशीवट पर बरबस मेरे मुख पर गुलाल मल दिया तथा मेरी मोतियों की लड़ तोड़ दी। यद्यपि तुम मेरे प्रियतम हो किन्तु ऐसा लोक विरुद्ध व्यवहार हमारे प्रेम में कलंक बन जायगा''। 'कृपालु' ने कहा - ''बलिहारी है सखी के प्यार पर जो एक ओर सर्वस्व समर्पण करती है, दूसरी ओर गाली देती है एवं बलिहारी है उन लम्पट श्यामसुन्दर पर जो ऐसे व्यवहार पर भी बलिहार जाते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 702-703

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
