# होरी खेलो न, श्याम सँग कोउ गोरी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0749-M18-K028
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: होरी-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 28
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 352–352

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>होरी खेलो न, श्याम सँग कोउ गोरी।  
<a id="line-2"></a>होरी खेलन मिस सखियन सों, करत फिरत नित बरजोरी।  
<a id="line-3"></a>निधरक कहत"हमारी प्यारी, मोते लेहु नात जोरी"।  
<a id="line-4"></a>नटखट झपटि खोलि घूँघट पट, मलत गुलाल गाल रोरी।  
<a id="line-5"></a>सब सोँ कहत"नेकु चलु कुंजनि", तकि उर मार सैन को री।  
<a id="line-6"></a>बात बनावति किमि “कृपालु” सखि!, मन चाहत चोरी-चोरी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

होली के अवसर पर श्यामसुन्दर के ऊधम से सखियों को सावधान करती हुई एक सखी कहती है कि अरी सखियों! श्यामसुन्दर के साथ कोई भी होली मत खेलो क्योंकि होली खेलने के बहाने वह सखियों के साथ अनेक प्रकार के अड़बंग व्यवहार करता है। वह निर्भयतापूर्वक प्रत्येक से "हमारी प्यारी ऐसा कहता है और यह भी कहता है कि तुम मेरे साथ पति का सम्बन्ध स्थापित कर लो। वह नटखट बेधड़क झपट कर घुँघट खोलकर, गालों में गुलाल मल देता है। कहाँ तक कहें वह निर्लज्ज सभी से यह कहता है कि जरा कुंज में चलो। साथ ही नैनों के कटाक्ष बाण से हृदय के भीतर प्रहार भी करता कृपालु'इस सखी से कहते हैं कि अरी सखी! तू अन्य सखियों को पट्टी पढ़ा रही है! मैं भली भाँति जानता हूँ कि तू श्यामसुन्दर से चोरी-चोरी प्यार करती है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 704-705

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
