# अरी कोउ, उर उरझी सुरझावे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0756-M19-K005
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 5
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 356–356

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अरी कोउ, उर उरझी सुरझावे।  
<a id="line-2"></a>ज्यों ज्यों जतन करत सुरझन को, त्यों त्यों अति उरझावे।  
<a id="line-3"></a>फाँसी भई दृगन की हाँसी, अब सोउ दृग झरि लावे।  
<a id="line-4"></a>मनहूँ जाय मिल्यो उनहिंन सँग, बुधि निज सुधि बिसरावे।  
<a id="line-5"></a>मोहिं अकेली जानि सहेली, विरह अनल धधकावे।  
<a id="line-6"></a>दीरघ श्वास-धूम-दृग-वारिद, कहँ लौं जल बरसावे।  
<a id="line-7"></a>बड़ कलंक सखि! अंक प्रेम पट, जो निज प्राण गँवावे।  
<a id="line-8"></a>अब “कृपालु” निज सिर धरि ओखलि, चोट ते कस घबरावे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

विरहिणी कहती है कि अरी सखि! मेरे हृदय में प्रियतम श्यामसुन्दर के मधुर-मिलन को उलझन को दया करके कोई सुलझा दे। मैं तो जितना ही इस उलझन को (प्रियतम स्मरण को) सुलझाती हूँ अर्थात् भुलाना चाहती हूँ उतना ही अधिक वह और उलझती जाती है, अर्थात् उतनी अधिक उनकी याद आती है। अरी सखि! आँखों की थोड़ी सी हँसी भी मेरे गले की फाँसी बन गयी है। अब वे आँखें भी के मधुर-मिलन के लिए तड़प रही हैं। मेरा मन भी प्रियतम से ही जा मिला एवं मेरी बुद्धि भी अपनी सुधि-बुधि खो बैठी तथा प्रेम विभोर हो गई। अतः मुझे अकेली समझ कर विरह ने मेरे अन्दर आग लगा दी। यद्यपि मैंने इस आग को बुझाने के लिए लम्बी-लम्बी साँसों की भाप को आँखों में बादल बनाकर उनसे निरन्तर ही जल बरसाया फिर भी आग नहीं बुझी। अरी सखि! यदि प्राण भी छोड़ देती हूँ तो प्रेम के उज्ज्वल वस्त्र पर महान् कलंक लग जाता है, क्योंकि प्रेम तो अमरत्व प्रदान करने वाला कहलाता है। अतएव अब तड्पने के सिवा दूसरा कोई चारा ही नहीं। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी विरहिणी! जब ओखली में सिर रख दिया तब चोटों से क्या घबराना।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 711-712

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
