# अरी सखि!, प्राण कंठ चलि आय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0761-M19-K010
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 10
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 358–358

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अरी सखि!, प्राण कंठ चलि आय।  
<a id="line-2"></a>अब तो जीवन-धन बिनु जीवन, कैसेहुँ रहि न सकाय।  
<a id="line-3"></a>उचकति चौंकति बकति तकति कछु, पुनि पुनि मुर्छा आय।  
<a id="line-4"></a>ऐसी हूक उठति हिय पुनि-पुनि, मनहुँ प्राण अब जाय।  
<a id="line-5"></a>है कोउ प्राणसखी लै प्राणन, प्राणनाथ मिलवाय।  
<a id="line-6"></a>अब “कृपालु” पिय आन मिलो न तु, होइहिं तोरि हँसाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है-अब तो प्रियतम के वियोग में प्राण निकलना चाहते हैं। तू ही बता, जीवनधन के बिना यह जीवन किस प्रकार रह सकता है। मैं उन्मादिनी की भाति कभी चौंकने लगती हूँ, कभी बकने लगती हूँ, कभी एकटक कुछ देखने लगती हूँ एवं कभी मूर्च्छित हो जाती हूँ। अरी सखि! हृदय में इतनी तीव्र हूक उठती है कि मानो इसी क्षण प्राण निकल जायेंगे। क्या मेरी ऐसी कोई हितैषिणी सखि है, जो मेरे प्राणों को भी लेकर एक बार प्राणनाथ से मिला दे? इतने में कृपालु' ने कहा-हे प्रियतम श्यामसुन्दर! अब शीघ्र ही इस विरहिणी से मिल लो अन्यथा तुम्हारी अकारण-करूणा की उपाधि की संसार हँसी उडायेगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 716

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
