# अरी सखि!, मति तोरी भरमाई।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0763-M19-K012
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 12
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 359–359

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अरी सखि!, मति तोरी भरमाई।  
<a id="line-2"></a>तेरी सौंह साँचु शशि-किरनन, नेकु न ताप लखाई।  
<a id="line-3"></a>श्रुति प्रमाण ते श्रेष्ठ कहत सब, बुध अनुभवहिं सदाई।  
<a id="line-4"></a>कहा सोच! तव रोम रोम महँ, प्रियतम रह्यो समाई।  
<a id="line-5"></a>ये दोउ नैन नेकु नहिं मानत, कोटि भाँति समुझाई।  
<a id="line-6"></a>तजु सखि! वैरिणि प्रीति नाहिं तो, तोर प्राण लै जाई।  
<a id="line-7"></a>तू “कृपालु” अनजान, लगी नहिं, छूटति कोटि उपाई॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक विरहिणी से उसकी अन्तरंग सखी का वाद विरहिणी से उसकी अन्तरंग सखी कहती है कि अरी सखि! तू पागल मत बन तुझे व्यर्थ ही भ्रम हो रहा है। मैं तेरी शपथ खाकर सत्य कहती हूँ कि चन्द्रमा की किरणों में किंचित् भी ताप नहीं है वरन् वह तो अत्यन्त शीतलता प्रदान करने वाला है। विरहिणी उत्तर देती है कि अरी सखी! सुने हुए अथवा वेदों के प्रमाण से भी श्रेष्ठ प्रमाण बुद्धिमान लोग अनुभव को बताते हैं। तात्पर्य यह है कि तेरी कही हुई बात तो श्रुति प्रमाण है किन्तु मेरे ऊपर बीती हुई बात प्रत्यक्ष अनुभव प्रमाण है फिर मैं तेरी बात कैसे मानूँ। फिर विरहिणी से उसकी सखि कहती है कि क्यों री! तू तो कहती है कि मेरा प्रियतम मेरे रोम-रोम में समाया हुआ है फिर तू इतनी चिन्तित क्यों है? विरहिणी उत्तर देती है कि अरी सखि! मैं स्वयं प्रियतम को नहीं चाहती किन्तु इन हठीली आँखों को कैसे समझाऊँ, यह किसी प्रकार नहीं समझतीं। फिर सखी विरहिणी से कहती है कि तू इस वैरिणि प्रीति को ही छोड़ दे, नहीं तो वह तेरा प्राण ही लेकर मानेगी। तब विरहिणी की ओर से 'कृपालु'उत्तर देते हैं कि अरी भोली-भाली सखी! तू प्रीति के विषय में अभी सर्वथा अज्ञ है। लगी हुई प्रीति करोड़ों उपायों से भी नहीं छूटती, इसका अनुभव केवल प्रेमिका को ही होता है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 717-718

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
