# ऊधो! कहि दीजो बलभ्रात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0774-M19-K023
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 23
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 364–364

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो! कहि दीजो बलभ्रात।  
<a id="line-2"></a>जैसी प्रीति करी तुम मोते, तैसी कहुँ न सुनात।  
<a id="line-3"></a>एक प्रेम लखि प्रेम करत जग, सब देखत दिन-रात।  
<a id="line-4"></a>इक बिनु प्रेमहिं प्रेम करत जग, सब जानत पितु मात।  
<a id="line-5"></a>इन दोउन सों रहित न काहुहिं, करत प्रेम इक तात।  
<a id="line-6"></a>तुम “कृपालु” नहिं इन तीनिउ महँ, सब अटपट तव बात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! प्राणवल्लभ श्यामसुन्दर से कह देना कि उन्होंने जिस प्रकार का प्रेम हम लोगों से किया है उस प्रकार का प्रेम कहीं सुनने में नहीं आता। अब तक तीन प्रकार के ही प्रेम विख्यात थे। एक तो वह जो दूसरे के प्रेम को देखकर प्रेम करते हैं। इसी को स्वार्थ का प्रेम भी कहते हैं। दूसरा प्रेम वह जिसमें बिना किसी के प्रेम किये ही प्रेम किया जाय। इस प्रकार का प्रेम सभी के माता-पिता (नवजात शिशु से) करते हैं। तीसरा वह है जो प्रेम करने वाले अथवा प्रेम न करने वाले दोनों से ही उदासीन रहता है। ऐसा प्रेमहीन हृदय आत्माराम, आप्तकाम, गुरुद्रोही एवं कृतघ्नी लोगों का होता है। 'कृपालु' के शब्दों में सखियाँ कहती हैं कि उद्धव! उनसे। 'कृपालु' के शब्दों में सखियाँ कहती हैं कि उद्धव! उनसे कहना कि तुम तो इन तीनों प्रेम से पृथक हो। तुम्हारी सभी आ अटपटी है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 727-728

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
