# ऊधो!, कहु कब ते अज्ञान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0786-M19-K035
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 35
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 368–369

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, कहु कब ते अज्ञान।  
<a id="line-2"></a>यदि अज्ञान"अनादि अनंतहिं", तो अद्वैत न मान।  
<a id="line-3"></a>यदि है"सादि अनंत"मिटै नहिं, वह कबहुँ जिय जान।  
<a id="line-4"></a>"सादि सांत"तो लहि निज रूपहिं, पुनि मिटि जैहैं ज्ञान।  
<a id="line-5"></a>जो लें मान"अनादि सांत"तो, सुनि लीजो करि कान।  
<a id="line-6"></a>जगहिं “कृपालु” अनादि अनंतहिं, वेदन करत बखान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

गोप वधूटियाँ उद्धव से कहती हैं कि यह तो बताओ कि जीवों में अज्ञान कब से है? यदि अज्ञान को अनादि एवं अनन्त मानते हैं, (अर्थात् अज्ञान न कभी प्रारम्भ हुआ था और न कभी समाप्त होगा) तब तो तुम्हारा अद्वैत सिद्धांत ही समाप्त हो जाता है, क्योंकि तब तो ब्रह्म एवं आज्ञान दोनों ही सनातन तत्व सिद्ध होंगे। यदि अज्ञान को सादि एवं अनन्त मान लिया जाय (एक दिन प्रारम्भ तो हुआ था किन्तु समाप्त कभी न होगा) तब तो किसी भी जीव की मुक्ति न होगी। यदि अज्ञान को सादि सान्त मान लिया जाय (एक दिन प्रारम्भ हुआ था एवं एक दिन समाप्त हो जायेगा) तब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि जीवात्मा अपने ज्ञान स्वरूप को प्राप्त होकर भी पुनः सांत मान लिया जाय (प्रारम्भ तो कभी नहीं हुआ किन्तु समाप्त हो जायगा) तो कान खोलकर सुन लो। 'कृपालु' कहते हैं कि फिर वेदों ने सृष्टि को अनादि अनन्त क्यों माना है? (सृष्टि सदा थी एवं सदा रहेगी) इस प्रकार ऊधो!! तुम्हारा अद्ठैत सिद्धान्त गलत सिद्ध हुआ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 736-737

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
