होरी-माधुरी · पद 14
यह होरी है, लली! या बरजोरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yaha horī hai, lalī! yā barajorī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1यह होरी है, लली! या बरजोरी।
2जहँ कहुँ पाव लँगर कोउ इकलिहिं, करत वाय रँग सरबोरी।
3तुम्हरे राज पाँय दुख हम सब, जाय लाज बाबा को री।
4लली कहीं, सब निज-निज घट महँ, भरहु रंग केसर घोरी।
5पुनि जल-यमुन भरन मिस चल सब, पिचकारिन घट महँ बोरी।
6एक सखी रह डगर ठड़ी अरु, सिगरी दुरहु कुंज खोरी।
7जैसेहिं लँगर वाय छेड़े सब, घेरि लेहु चारिहुँ ओरी।
8पुनि इक संग रंग पिचकारिन, मारि मलहु गालहुँ रोरी।
9पुनि सब पकरि बांधि लै आवहु, सुनहु सखी मोरी पोरी।
10तब “कृपालु” हौं मन की करिहौं, कहिहौं"कहु कैसी होरी?"॥
हिन्दी भावार्थ
होली के दिनों में श्यामसुन्दर के ऊधम से तंग आकर किशोरी जी से एक सखी कहती है, हे किशोरी जी! को अकेली पाता है उसके अंग-अंग को रंग में सराबोर कर देता है। तुम्हारे राज्य में हम सब इस प्रकार दुःख पायें, यह वृषभानु बाबा की लज्जा का प्रश्न है।''किशोरी जी ने आज्ञा दी है कि समस्त सखियाँ अपने-अपने घड़ों में केशर घोल कर भर लें, फिर जमुना जल भरने के बहाने घड़ा सिर पर रख कर चलें एवं अपनी-अपनी पिचकारी को अपने-अपने घड़ों में डुबो दें। एक सखी मार्ग के बीचों-बीच खड़ी हो जाये तथा शेष सखियाँ लताओं के बीच छिप जायें। जैसे ही वह नटखट मार्ग में खड़ी उस सखी को छेड़े वैसे ही समस्त सखियाँ मिलकर एक साथ चारों ओर से घेर लें। फिर सब सखियाँ एक साथ ही उसे रंग में सराबोर कर दें एवं एक साथ ही भली-भाति गुलाल भी मल दें। फिर सब सखियाँ पकड़कर और बाँधकर उसे मेरे महल में ले आवें। 'कृपालु' के शब्दों में किशोरी जी कहती हैं फिर मैं अपनी मनमानी करूँगी अब कहो कैसी होली है?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 692-693