लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

होरी-माधुरी · पद 13

यह होरी है, अरी या होरा है।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yaha horī hai, arī yā horā hai

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1यह होरी है, अरी या होरा है।

2दूभर भयो घरहुँ ते निकरन, कैसो गाम निगोरा है।

3तनु ही नहिं मनहूँ सखि कारो, मैया कह"यह भोरा है"।

4यह नहिं इकलो चलत, रहत सखि!, संग करोरन छोरा है।

5कालिहिं भयो ब्याहु मम आजुहिं, पकरि मोहिं झकझोरा है।

6घूँघट टारि फारि कंचुकि पट, कह"कहु सखि कस जोरा है"।

7निधरक गाल गुलाल लाल मलि, पिचकारिन रँग बोरा है।

8पुनि कह"जो पूछे पिय तेरो, कहियो सो पिय मोरा है"।

9कह “कृपालु” हम जानत नीके, यह तेरो चितचोरा है॥

हिन्दी भावार्थ

होली के दिनों में श्यामसुन्दर के अनुराग से तंग आकर एक नवविवाहित वधू कहती है—'अरी दैया! यह होरी है कि होरा है? घर से निकलना भी दुश्वार हो गया है। तन ही नहीं, मन भी काला है।' इस पर मैया कहती है—'मेरा लाला तो भोला-भाला है।' अरी सखी! यह अकेला नहीं चलता, साथ में करोड़ों ग्वालबाल लिये रहता है। कल ही तो मेरा ब्याह हुआ और आज ही मुझे पकड़ कर इसने झकझोर डाला। घूँघट को हटा दिया, अँगिया फाड़ दी एवं कहने लगा—'अरी सखी! बता मेरा तेरा जोड़ा कैसा रहेगा?' तत्पश्चात् बेधड़क मेरे गाल में गुलाल मल दिया एवं पिचकारियों से रंग में सराबोर कर दिया। फिर कहने लगा कि अगर तेरा पति पूछे यह रंग किसने छोड़ा है तो कह देना प्रियतम ने छोड़ा है। 'कृपालु' कहते हैं—अरी विवाहिता वधू! तू झूठी शिकायत क्यों कर रही है, हम सब समझते हैं कि वह तेरे मन भा गया है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 691-692