# यह होरी है, अरी या होरा है।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0734-M18-K013
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: होरी-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 13
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 345–345

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>यह होरी है, अरी या होरा है।  
<a id="line-2"></a>दूभर भयो घरहुँ ते निकरन, कैसो गाम निगोरा है।  
<a id="line-3"></a>तनु ही नहिं मनहूँ सखि कारो, मैया कह"यह भोरा है"।  
<a id="line-4"></a>यह नहिं इकलो चलत, रहत सखि!, संग करोरन छोरा है।  
<a id="line-5"></a>कालिहिं भयो ब्याहु मम आजुहिं, पकरि मोहिं झकझोरा है।  
<a id="line-6"></a>घूँघट टारि फारि कंचुकि पट, कह"कहु सखि कस जोरा है"।  
<a id="line-7"></a>निधरक गाल गुलाल लाल मलि, पिचकारिन रँग बोरा है।  
<a id="line-8"></a>पुनि कह"जो पूछे पिय तेरो, कहियो सो पिय मोरा है"।  
<a id="line-9"></a>कह “कृपालु” हम जानत नीके, यह तेरो चितचोरा है॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

होली के दिनों में श्यामसुन्दर के अनुराग से तंग आकर एक नवविवाहित वधू कहती है—'अरी दैया! यह होरी है कि होरा है? घर से निकलना भी दुश्वार हो गया है। तन ही नहीं, मन भी काला है।' इस पर मैया कहती है—'मेरा लाला तो भोला-भाला है।' अरी सखी! यह अकेला नहीं चलता, साथ में करोड़ों ग्वालबाल लिये रहता है। कल ही तो मेरा ब्याह हुआ और आज ही मुझे पकड़ कर इसने झकझोर डाला। घूँघट को हटा दिया, अँगिया फाड़ दी एवं कहने लगा—'अरी सखी! बता मेरा तेरा जोड़ा कैसा रहेगा?' तत्पश्चात् बेधड़क मेरे गाल में गुलाल मल दिया एवं पिचकारियों से रंग में सराबोर कर दिया। फिर कहने लगा कि अगर तेरा पति पूछे यह रंग किसने छोड़ा है तो कह देना प्रियतम ने छोड़ा है। 'कृपालु' कहते हैं—अरी विवाहिता वधू! तू झूठी शिकायत क्यों कर रही है, हम सब समझते हैं कि वह तेरे मन भा गया है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 691-692

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
