होरी-माधुरी · पद 12
यह छोरा है, सखी या छोरी है।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yaha chhorā hai, sakhī yā chhorī hai
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1यह छोरा है, सखी या छोरी है।
2याको लखि श्रृंगार लगत अस, मानहुँ नवल-किशोरी है।
3पै लखि याको हाव-भाव सखि!, नहिं लागति यह गोरी है।
4कोऊ सखि कह छवि लखि लागत, काहू की चितचोरी है।
5कोऊ सखि कह तनु अंगनि लखु, लगत पुरुष को-सो री है।
6कह “कृपालु” यह ब्रह्म नपुंसक, सखिन कहत हो होरी है॥
हिन्दी भावार्थ
होली में हारे हुए श्यामसुन्दर को पकड़ कर सखियों ने एक सुन्दरी का शृंगार कर दिया जिसे देखकर एक सखी नल है-''अरी सखी! यह लड़का है अथवा लड़की है। उसके सोलह शृंगार को देखकर तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह लड़की है, किन्तु इसके हाव-भाव को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह लड़का है।''एक सखी ने कहा कि इसको सुन्दरता देखकर ऐसा लगता है कि यह किसी की स्त्री ही है। एक और सखी ने कहा कि इसके शरीर के अंग-प्रत्यंग को देख कर ऐसा लगता है कि यह पुरुष ही है। इतने में कृपालु' ने भी होली के हास्य रस में कहा कि यह न पुरुष है, न स्त्री है, यह तो ब्रह्म त्रिकाल में नपुंसक लिंग ही होता है। यह सुनकर सखियों ने भी ''होरी है, होरी है''कह कर प्रेमोपहास किया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 690-691