होरी-माधुरी · पद 11
माधव सँग, माधव आयो री।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mādhava saṁga, mādhava āyo rī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1माधव सँग, माधव आयो री।
2चलु माधवि! सखियन सँग माधव, माधवि-कुंज बुलायो री।
3कह माधवि हम जानत माधव, कुंजन फाग रचायो री।
4अलिगन छलन चहत सो छलिया, याते अस जनि जायो री।
5सब ब्रज नारिन लै पिचकारिन, कंचुकि माहिं दुरायो री।
6कनक कटोरिन भरि-भरि रोरिन, तापर कुसुम सजायो री।
7कछु सखियन भरि-भरि घट रंगन, कुंजन माहिं बिठायो री।
8पुनि तहँ जाय रंग इक संगहिं, डारि गुलाल उड़ायो री।
9पुनिकोउकर, कोउपग, कोउकटिधरि, बांधिललिहिंढिगलायोरी।
10तहाँ “कृपालु” बनाय दुल्हनियाँ, घर-घर जाय दिखायो री॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर भी आये हैं। ''हे किशोरी जी! सखियों के साथ चलो श्यामसुन्दर ने तुम्हें माधवी कुंज में बुलाया है।''किशोरी जी ने कहा-' अरी सखी! मैं जान गयी; श्यामसुन्दर निकुंज में होली खेलना चाहते हैं। वे छलपूर्वक सबको बुला रहे हैं इसलिये खाली हाथ कोई मत जाना। सब सखियाँ पिचकारी को चोली में छिपा लो एवं सोने की कटोरिंयों में सब लोग गुलाल भर लो, उसके ऊपर फूलों को सजा लो। कुछ सखियाँ रंग बिरंगे रंगों को घड़ों में भरकर लताऔँ में छुपकर बैठ जाओ। फिर वहाँ जाकर सब लोग एक साथ ही पिचकारियों से रंग मारो तथा एक साथ ही गुलाल भी उड़ाओ। फिर चारों ओर से घेर कर कोई उसका हाथ पकड़ लो। इस प्रकार बाँध कर मेरे पास ले आओ!''कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी के पास ले जाकर दुलहिन बनाकर घर-घर में दिखला आओ। मुँह दिखाई में जो कुछ मिले उसका प्रसाद बाँट देना।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 689-690