होरी-माधुरी · पद 10
भाजो भाजो री, कान्ह लखु होरी ते।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhājo bhājo rī, kānha lakhu horī te
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1भाजो भाजो री, कान्ह लखु होरी ते।
2एक अचंभो देखु सखी यह, हार्यो छोरा छोरी ते।
3सिगरे ब्रज को माखन खायो, बरजोरी कहुँ चोरी ते।
4तदपि भज्यो तजि मुरलि पीत-पट, गहवर वन की खोरी ते।
5कछुक दूरि भजि पुनि हरि कह सुनु, का होरी सखि गोरी ते।
6कह “कृपालु” यह बात कहिय अब, जाय आपुनी पोरी ते॥
हिन्दी भावार्थ
होली में हार कर भागते हुए श्यामसुन्दर को देखकर एक सखी कहती है-' अरी सखी! देख-देख! एक आश्चर्य देख! एक छोरी से हार कर नन्द का छोरा भागा जा रहा है। अरी सखी! जिसने सारे ब्रज का मक्खन खा डाला, कुछ तो देने पर खाया, कुछ चोरी से खाया और कुछ सीनाजोरी से खाया। वह छोरी से हारकर मुरली एवं पीताम्बर छोड़कर गहवर वन की लताओं के बीच से होकर, डर कर भाग रहा है।''कुछ दूर भागकर श्यामसुन्दर ने पीछे की ओर देखा और खिसिया कर कहा-'"मैं भाग नहीं रहा हूँ किन्तु एक छोरी से होली खेलना मुझ परमपुरुष को शोभा नहीं देता।''श्यामसुन्दर की यह बात सुनकर प्यार भरे व्यंग्य में 'कृपालु' ने कहा कि अभी थोड़ी ही दूरी पर हो, यह 'चैलेंज'अपने द्वार पर जाकर करना।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 688-689