होरी-माधुरी · पद 9
भाजो भाजो री, कान्ह पकड़ो, पकड़ो।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhājo bhājo rī, kānha pakad̤o, pakad̤o
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1भाजो भाजो री, कान्ह पकड़ो, पकड़ो।
2आजु चखाउ मजा नटखट को, मिटि जावे नित को रगड़ो।
3होरी खेलन हित फागुन महँ, जहँ देखो अकड़ो, अकड़ो।
4सखिन जूह जुरि घेरि लेहु हरि, भाजि न पाव बाँधि जकड़ो।
5पुनि बनाय होरी को भँड़ुवा, कहहु लली सोँ अब हँकड़ो।
6तब “कृपालु” कछु बस न चलेगो, मुख ताकेगो खड़ोइ खड़ो॥
हिन्दी भावार्थ
होली में एक सखी अन्य सखियों से कहती है कि देखो! देखो! श्यामसुन्दर मैदान छोड़ कर भागे जा रहे हैं-पकड़ो पकड़ो। अरी सखियों। आज इस नटखट को भली-भाँति मजा चखा दो, जिससे सदा के लिये झगड़ा मिट जाय। यह नटखट होली खेलने के लिये सदा ही जहाँ देखो वहीं अकड़ा करता है। समस्त सखियों का झुण्ड इकट्ठा करके इसे घेर लो एवं पकड़ कर बाँध दो, भागने न पाये। तत्पश्चात् इसे होरी का भडुआ बनाकर कहो कि हमारी स्वामिनी जी से और हंकडोगे? कृपालु' कहते हैं कि तब छलिया का कुछ भी बस न चलेगा बस वह खड़ा-खड़ा मुँह ही ताकता रहेगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 688