होरी-माधुरी · पद 8
बरजो री, लँगर कर बरजोरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: barajo rī, laṁgara kara barajorī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बरजो री, लँगर कर बरजोरी।
2गालन लाल-गुलाल मलन मिस, गालन लाल मलत गोरी।
3कबहुँ मोरि मोतिन-लर तोरी, कबहुँ मोरि गागर फोरी।
4गारी सुनि कह"पुनि दे प्यारी, भल जोरी मोरी तोरी"।
5मैया सोँ कह, सो कह दैया! तुम सब जोवन-मद बोरी।
6कह “कृपालु” को साँचु मान जब, लाला पाँच बरस कोरी॥
हिन्दी भावार्थ
होली के दिनों में श्यामसुन्दर के प्यार में सराबोर उलाहना देती हुई एक सखी कहती है-''अरी कोई सखी श्यामसुन्दर को रोको। मेरे साथ जबर्दस्ती कर रहा है। यह नटखट गाल में गुलाल मलने के बहाने ब्रजबालाओं के गाल को ही मल देता है। कभी मोतियों की लड़ तोड़ देता है और कभी मरको फोड़ देता है, इतना निर्लज्ज है कि गाली देने पर कहता है-'अरी प्यारी! फिर से गाली दे, मेरी तेरी जोड़ी बहुत अच्छी है।'और जब इसकी शिकायत मैया से करती हुँ तो हाय राम! मैया यह कहती है कि तुम लोगों को जवानी का मद छाया हुआ है।'''कृपालु' कहते है ''अरी सखि'! तेरी बात को कौन सच मानेगा?? जबकि श्यामसुन्दर अभी पाँच वर्ष के ही हैं।?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 687