होरी-माधुरी · पद 7
देखो देखो री, ठिठोरी होरी की।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dekho dekho rī, ṭhiṭhorī horī kī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1देखो देखो री, ठिठोरी होरी की।
2परम-पुरुष को नारि बनायो, छवि जनु श्यामा गोरी की।
3अटपट पट भूषन पहिरायो, चुनरी पीत पिछोरी की।
4सेंदुर, काजर, मेहँदी, मिहावरि, माथे बिंदी रोरी की।
5बारम्बार उचार सखिन सब, जय-जयकार किशोरी की।
6करत विविध परिहास कहति"कित, बानि गई बरजोरी की?।
7कोउ कह याय नचावन लै चलु, कुंजनि गहवर खोरी की।
8कह “कृपालु” बलि-बलि होरी की, बलि बलि बलि बलि छोरी की॥
हिन्दी भावार्थ
होली में श्यामसुन्दर को सखियों द्वारा छोरी बना देने पर एक परमहँस कहता है अरे! होली की ठिठोरी तो देखो! परमपुरुष भगवान् को सखियों ने स्त्री बना दिया। सचमुच ही स्त्री का भान होता है। अटपटे वस्त्र एवं आभूषण पहिना दिये हैं, पीताम्बर की चुनरी उढ़ा दी है। सिर में सेंदुर, आँख में काजल, हाथ में मेहँदी, पैरों में मिहावर एवं ललाट में रोली की बिंदी लगा दी है। समस्त सखियाँ बार-बार किशोरी जी को जयकार बोल रही हैं। अनेक प्रकार के मधुर परिहास करती हुई सखियाँ कहती हैं-''तुम्हारी जबर्दस्ती वाली आदत इस समय कहाँ चली गयी है??''किसी सखी ने कहा-इस क को गहवर-वन की कुंज में नचाने के लिए ले चलो। कृयालु'कहते हैं, ऐसी होली को तो बार-बार बलिहार है एवं ऐसी छोरी को तो अनन्त बार बलिहार है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 686-687