# भाजो भाजो री, कान्ह पकड़ो, पकड़ो।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0730-M18-K009
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: होरी-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 9
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 343–343

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>भाजो भाजो री, कान्ह पकड़ो, पकड़ो।  
<a id="line-2"></a>आजु चखाउ मजा नटखट को, मिटि जावे नित को रगड़ो।  
<a id="line-3"></a>होरी खेलन हित फागुन महँ, जहँ देखो अकड़ो, अकड़ो।  
<a id="line-4"></a>सखिन जूह जुरि घेरि लेहु हरि, भाजि न पाव बाँधि जकड़ो।  
<a id="line-5"></a>पुनि बनाय होरी को भँड़ुवा, कहहु लली सोँ अब हँकड़ो।  
<a id="line-6"></a>तब “कृपालु” कछु बस न चलेगो, मुख ताकेगो खड़ोइ खड़ो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

होली में एक सखी अन्य सखियों से कहती है कि देखो! देखो! श्यामसुन्दर मैदान छोड़ कर भागे जा रहे हैं-पकड़ो पकड़ो। अरी सखियों। आज इस नटखट को भली-भाँति मजा चखा दो, जिससे सदा के लिये झगड़ा मिट जाय। यह नटखट होली खेलने के लिये सदा ही जहाँ देखो वहीं अकड़ा करता है। समस्त सखियों का झुण्ड इकट्ठा करके इसे घेर लो एवं पकड़ कर बाँध दो, भागने न पाये। तत्पश्चात् इसे होरी का भडुआ बनाकर कहो कि हमारी स्वामिनी जी से और हंकडोगे? कृपालु' कहते हैं कि तब छलिया का कुछ भी बस न चलेगा बस वह खड़ा-खड़ा मुँह ही ताकता रहेगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 688

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
