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RADHEY RADHEY

होरी-माधुरी · पद 4

चंचल चलु, हट तजु अंचल-पट।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chañchala chalu, haṭu taju añchala-paṭa

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1चंचल चलु, हट तजु अंचल-पट।

2हौं क्वाँरी तू क्वाँरो नटखट, लख ब्रजनारिन लख लंपट।

3जो होरी खेलन रुचि तोरी, ऐहौं चोरी वंशीवट।

4रंग-बिरंग अनंग-विमोहन!, ल्यैहौं संग रंग भरि घट।

5और कान्ह! इक बात कान सुनु, जनि सखान ल्यैयो नटखट।

6इमि कहि देखन-मिस पिचकारिहिं, लै कर रँग मार्यो झटपट।

7हँसि “कृपालु” कह होरी है, होरी है, सखियन ताल पिटी पटपट॥

हिन्दी भावार्थ

होली के दिनों में दिव्य-प्रेम-माधुरी में विभोर एक ब्रजांगना श्यामसुन्दर से कहती है-''हे चंचल! मेरा अंचल छोड़ दे! दूर हट जा! अरे लम्पट! मैं अविवाहित हूँ और तू भी अविवाहित है। उधर देख! ब्रजांगनाएँ हम दोनों की ओर देख रहीं हैं। यदि तुम्हारी होली खेलने की सचमुच ही इच्छा है तो चुपके से वंशीवट पर आ जाऊँगी एवं कई घड़े रंग निरंगे रंग भी ले आऊँगी, तब होली खेल लेना। किन्तु एक गुप्त बात कान में कहूँगी-वह यह कि ग्वालबालों को साथ न लाना, तुम अकेले आना।''श्यामसुन्दर ने उसकी बात का विश्वास कर लिया। सखी ने यह जानकर पिचकारी देखने के बहाने श्यामसुन्दर को रंग से सराबोर कर दिया। खिसियाये हुए श्यामसुन्दर को देखकर 'कृपालु' ने कहा-''होरी है! होरी है! बुरा न मानो!!''साथ ही सखियों ने भी कृपालु का संकेत पाकर करतल ध्वनि की।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 683-684