होरी-माधुरी · पद 3
करत हरि, होरी महँ हुरदंग।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: karata hari, horī mahaṁ huradaṅga
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1करत हरि, होरी महँ हुरदंग।
2देखु सखी! जनु तांडव-गति सोँ, निरतत शत्रु-अनंग।
3बाजत वीणा, वेणु, ढोल, ढप, चंग, मृदंग, उपंग।
4रंग-बिरंग रंग पिचकारिन, मारत तकि तकि अंग।
5सखिन समेत श्याम-सुंदर को, इंद्रधनुष सों रंग।
6एतिक उड़त गुलाल लाल भये, भू-अंबर इक संग।
7लाल-गुलालन लखि न परत पुनि, बूड़ी प्रेम-तरंग।
8सखि मुख हरि-मुख जानि मलति सखि, रोरिहिं गति अड़बंग।
9सुधि नहिं भूषन वसन काहु कहँ, पिये मनहुँ सब भंग।
10सखियन लरत परस्पर लखि हरि, दुरि गयो कुंज-लवंग।
11कह “कृपालु” धनि छलिन-शिरोमणि, धनि उन इन छल-ढंग॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर होली में हुड़दंग कर रहे हैं ''अरी सखी! देख ऐसा लगता है जैसे शंकरजी ताण्डव-नृत्य कर रहे हों। वीणा, वेणु, ढोल, चंग, मृदंग, उपंग आदि बाजे बज रहे हैं। पिचकारियं द्वारा प्रत्येक अंग में ताक-ताक कर अनेक प्रकार के रंग मार रहे हैं। सखियों सहित श्यामसुन्दर का रंग इन्द्रधनुष के समान रंग बिरँगा हो गया है। इतना अधिक गुलाल उड़ाया गया कि पृथ्वी एवं आकाश सब लाल रंग के हो गये। इस प्रकार एक तो लाल-गुलालों से कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था दूसरे सभी सखियाँ प्रेम विभोर होने के कारण सुध-बुध खो बैठीं थीं। अतएव सखियों ने सखियों के ही मुख को श्यामसुन्दर का मुख जानकर गुलाल मलना आरम्भ कर दिया। किसी को अपने गहने, वस्त्र आदि का होश नहीं है, मानो सब भंग पिए हुये हैं। सखियों को परस्पर लड़ते हुए देख कर चुपके से लवंग -कुंज में श्यामसुन्दर छिप गये। 'कृपालु' कहते हैं उस छलिया के नेता को धन्य है एवं उसके इस अनोखे छल के ढंग को भी धन्य है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 682-683