होरी-माधुरी · पद 2
आजु होरी री, अरी ओरी गोरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āju horī rī, arī o rī gorī!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1आजु होरी री, अरी ओरी गोरी।
2हैं सिगरी गोरी रँग-बोरी, तू क्यों री कोरी-कोरी।
3मेरो पिय परदेश गयो पुनि, हौं कैसे खेलौं होरी।
4कह्यो कान्ह"इक बात कान सुनु, कहौं सखी! चोरी-चोरी।
5तेरो तो साँचो पिय हौं ही, नेकु देखु मोरी ओरी"।
6लखतहिं भई विभोर गूजरी, लोक-लाज तृण सम तोरी।
7अवसर पाइ “कृपालु” तबहिं हरि, किय नख-शिख रँग सरबोरी॥
हिन्दी भावार्थ
होली के दिन श्यामसुन्दर एक सखी से कहते हैं ''अरी सखी! रंग में सराबोर हैं किन्तु आश्चर्य है कि तू भीतर-बाहर कोरी ही है, क्या कारण है?''सखी ने उत्तर दिया-''मेरे पति ब्रज से बाहर गये हैं फिर भला मैं पतित्रता किस प्रकार होली खेलूँ?''श्यामसुन्दर ने सखी से कहा-''एक बात अत्यन्त गुप्त है, तेरे कान में कहूँगा'', और यह कहा-''अरी सखी! मेरी ओर देख एवं मुझे पहिचान, तुझ जीवात्मा का सच्चा प्रियतम तो मैं ही हूँ। लोक-वेद से अतीत दिव्य-रस में समाधिस्थ हो गयी। कहते हैं कि श्यामसुन्दर ने समाधिस्थ सखी को बाहर से भी रंग से सराबोर कर दिया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 681-682