# आजु होरी री, अरी ओरी गोरी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0723-M18-K002
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: होरी-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 2
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 339–340

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>आजु होरी री, अरी ओरी गोरी।  
<a id="line-2"></a>हैं सिगरी गोरी रँग-बोरी, तू क्यों री कोरी-कोरी।  
<a id="line-3"></a>मेरो पिय परदेश गयो पुनि, हौं कैसे खेलौं होरी।  
<a id="line-4"></a>कह्यो कान्ह"इक बात कान सुनु, कहौं सखी! चोरी-चोरी।  
<a id="line-5"></a>तेरो तो साँचो पिय हौं ही, नेकु देखु मोरी ओरी"।  
<a id="line-6"></a>लखतहिं भई विभोर गूजरी, लोक-लाज तृण सम तोरी।  
<a id="line-7"></a>अवसर पाइ “कृपालु” तबहिं हरि, किय नख-शिख रँग सरबोरी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

होली के दिन श्यामसुन्दर एक सखी से कहते हैं ''अरी सखी! रंग में सराबोर हैं किन्तु आश्चर्य है कि तू भीतर-बाहर कोरी ही है, क्या कारण है?''सखी ने उत्तर दिया-''मेरे पति ब्रज से बाहर गये हैं फिर भला मैं पतित्रता किस प्रकार होली खेलूँ?''श्यामसुन्दर ने सखी से कहा-''एक बात अत्यन्त गुप्त है, तेरे कान में कहूँगा'', और यह कहा-''अरी सखी! मेरी ओर देख एवं मुझे पहिचान, तुझ जीवात्मा का सच्चा प्रियतम तो मैं ही हूँ। लोक-वेद से अतीत दिव्य-रस में समाधिस्थ हो गयी। कहते हैं कि श्यामसुन्दर ने समाधिस्थ सखी को बाहर से भी रंग से सराबोर कर दिया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 681-682

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
