# करत हरि, होरी महँ हुरदंग।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0724-M18-K003
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: होरी-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 3
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 340–340

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>करत हरि, होरी महँ हुरदंग।  
<a id="line-2"></a>देखु सखी! जनु तांडव-गति सोँ, निरतत शत्रु-अनंग।  
<a id="line-3"></a>बाजत वीणा, वेणु, ढोल, ढप, चंग, मृदंग, उपंग।  
<a id="line-4"></a>रंग-बिरंग रंग पिचकारिन, मारत तकि तकि अंग।  
<a id="line-5"></a>सखिन समेत श्याम-सुंदर को, इंद्रधनुष सों रंग।  
<a id="line-6"></a>एतिक उड़त गुलाल लाल भये, भू-अंबर इक संग।  
<a id="line-7"></a>लाल-गुलालन लखि न परत पुनि, बूड़ी प्रेम-तरंग।  
<a id="line-8"></a>सखि मुख हरि-मुख जानि मलति सखि, रोरिहिं गति अड़बंग।  
<a id="line-9"></a>सुधि नहिं भूषन वसन काहु कहँ, पिये मनहुँ सब भंग।  
<a id="line-10"></a>सखियन लरत परस्पर लखि हरि, दुरि गयो कुंज-लवंग।  
<a id="line-11"></a>कह “कृपालु” धनि छलिन-शिरोमणि, धनि उन इन छल-ढंग॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर होली में हुड़दंग कर रहे हैं ''अरी सखी! देख ऐसा लगता है जैसे शंकरजी ताण्डव-नृत्य कर रहे हों। वीणा, वेणु, ढोल, चंग, मृदंग, उपंग आदि बाजे बज रहे हैं। पिचकारियं द्वारा प्रत्येक अंग में ताक-ताक कर अनेक प्रकार के रंग मार रहे हैं। सखियों सहित श्यामसुन्दर का रंग इन्द्रधनुष के समान रंग बिरँगा हो गया है। इतना अधिक गुलाल उड़ाया गया कि पृथ्वी एवं आकाश सब लाल रंग के हो गये। इस प्रकार एक तो लाल-गुलालों से कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था दूसरे सभी सखियाँ प्रेम विभोर होने के कारण सुध-बुध खो बैठीं थीं। अतएव सखियों ने सखियों के ही मुख को श्यामसुन्दर का मुख जानकर गुलाल मलना आरम्भ कर दिया। किसी को अपने गहने, वस्त्र आदि का होश नहीं है, मानो सब भंग पिए हुये हैं। सखियों को परस्पर लड़ते हुए देख कर चुपके से लवंग -कुंज में श्यामसुन्दर छिप गये। 'कृपालु' कहते हैं उस छलिया के नेता को धन्य है एवं उसके इस अनोखे छल के ढंग को भी धन्य है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 682-683

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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