होरी-माधुरी · पद 5
चल्यो सखि, अस पिचकारिन रंग।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chalyo sakhi! asa pichakārina raṅga
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1चल्यो सखि, अस पिचकारिन रंग।
2ललित-त्रिभंग अनंग-विमोहन, ह्वै गये रंग-बिरंग।
3चंग, मृदंग, उपंग संग ही, बाजत अद्भुत ढंग।
4वयस किशोरिन जुरि ब्रज-गोरिन, गावत होरिन संग।
5मारति रंग अंग प्रति अंगनि, प्रेम-तरंग उमंग।
6कह “कृपालु” मनसुख मन सुख अति,"पिये सखिन सब भंग"॥
हिन्दी भावार्थ
होली के रंग की बहार में एक सखी कहती है अरी सखी! आज तो पिचकारियों द्वारा इतना रंग फेंका गया कामदेव को मोहित करने वाले श्यामसुन्दर का नीला शरीर रंग बिरंगे रंगों से युक्त हो गया। और सखी! चंग, मृदंग उपंगादि अनेक वाझवृन्द भी अत्यन्त अनोखे ढंग से बजाये जा रहे थे। किशोर अवस्था की हजारों गोपियाँ होली के गीत भी गाती जा रही थीं। होली एवं प्रेम की तरंग में डूबी हुई ब्रजांगनाएँ श्यामसुन्दर के अंग-अंग में पिचकारियों द्वारा रंग मार रहीं थीं। 'कृपालु' कहते हैं कि उसी समय विनोदी मनसुखा ने अति प्रसन्न होकर, सब की विचित्र गति देखकर कहा कि आज तो समस्त सखियों ने एक साथ अधिक मात्रा में भांग पी ली है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 684-685