# चंचल चलु, हट तजु अंचल-पट।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0725-M18-K004
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: होरी-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 4
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 341–341

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>चंचल चलु, हट तजु अंचल-पट।  
<a id="line-2"></a>हौं क्वाँरी तू क्वाँरो नटखट, लख ब्रजनारिन लख लंपट।  
<a id="line-3"></a>जो होरी खेलन रुचि तोरी, ऐहौं चोरी वंशीवट।  
<a id="line-4"></a>रंग-बिरंग अनंग-विमोहन!, ल्यैहौं संग रंग भरि घट।  
<a id="line-5"></a>और कान्ह! इक बात कान सुनु, जनि सखान ल्यैयो नटखट।  
<a id="line-6"></a>इमि कहि देखन-मिस पिचकारिहिं, लै कर रँग मार्यो झटपट।  
<a id="line-7"></a>हँसि “कृपालु” कह होरी है, होरी है, सखियन ताल पिटी पटपट॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

होली के दिनों में दिव्य-प्रेम-माधुरी में विभोर एक ब्रजांगना श्यामसुन्दर से कहती है-''हे चंचल! मेरा अंचल छोड़ दे! दूर हट जा! अरे लम्पट! मैं अविवाहित हूँ और तू भी अविवाहित है। उधर देख! ब्रजांगनाएँ हम दोनों की ओर देख रहीं हैं। यदि तुम्हारी होली खेलने की सचमुच ही इच्छा है तो चुपके से वंशीवट पर आ जाऊँगी एवं कई घड़े रंग निरंगे रंग भी ले आऊँगी, तब होली खेल लेना। किन्तु एक गुप्त बात कान में कहूँगी-वह यह कि ग्वालबालों को साथ न लाना, तुम अकेले आना।''श्यामसुन्दर ने उसकी बात का विश्वास कर लिया। सखी ने यह जानकर पिचकारी देखने के बहाने श्यामसुन्दर को रंग से सराबोर कर दिया। खिसियाये हुए श्यामसुन्दर को देखकर 'कृपालु' ने कहा-''होरी है! होरी है! बुरा न मानो!!''साथ ही सखियों ने भी कृपालु का संकेत पाकर करतल ध्वनि की।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 683-684

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
