मुरली-माधुरी · पद 8
रवति कहुँ, मुरली कुंज कुटीर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ravati kahuṁ, muralī kuñja kuṭīra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रवति कहुँ, मुरली कुंज कुटीर।
2सुरभि वृंद दोना करि कानन, पियत मूँदि दृग वीर।
3क्षुधा क्षुधित बछरन मुख थन, पै, पियत नाहिं बह क्षीर।
4मुरछित गिरत अवनितर तरु ते, खग-पिक, केकी कीर।
5शिव सनकादि परमहंसन दृग, झर-झर बरसत नीर।
6कहँ लौं कह “कृपालु” कालिंदिहुँ, धार भई लखु थीर॥
हिन्दी भावार्थ
अरी! लता कुंजों में कहीं मधुर मुरली बज रही है। देख तो सखि। गायों के झुण्ड कानों का दोना बनाकर आँख मूँदकर मुरली सुधा रस पी रहे हैं। यद्यपि बछड़े भूखे हैं एवं उनके मुख में भी गायों का थन है, थन से दूध बह रहा है किन्तु मुरली की ध्वनि के वशीभूत होकर वे भी दूध नहीं पीते हैं। कोयल, मोर, तोते आदि पक्षी वृक्ष से मूर्च्छित हो-होकर पृथ्वी पर गिर रहे हैं। शिव सनकादिक परमहँसों की आँखों से आनन्द के आँसू नह रहे हैं। 'कृपालु' के शब्दों में अरी सखि! कहाँ तक कहूँ, यमुना जी की स्वाभाविक धारा भी स्थिर हो गयी है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 677-678