# रवति कहुँ, मुरली कुंज कुटीर।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0720-M17-K008
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मुरली-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 8
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 338–338

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>रवति कहुँ, मुरली कुंज कुटीर।  
<a id="line-2"></a>सुरभि वृंद दोना करि कानन, पियत मूँदि दृग वीर।  
<a id="line-3"></a>क्षुधा क्षुधित बछरन मुख थन, पै, पियत नाहिं बह क्षीर।  
<a id="line-4"></a>मुरछित गिरत अवनितर तरु ते, खग-पिक, केकी कीर।  
<a id="line-5"></a>शिव सनकादि परमहंसन दृग, झर-झर बरसत नीर।  
<a id="line-6"></a>कहँ लौं कह “कृपालु” कालिंदिहुँ, धार भई लखु थीर॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरी! लता कुंजों में कहीं मधुर मुरली बज रही है। देख तो सखि। गायों के झुण्ड कानों का दोना बनाकर आँख मूँदकर मुरली सुधा रस पी रहे हैं। यद्यपि बछड़े भूखे हैं एवं उनके मुख में भी गायों का थन है, थन से दूध बह रहा है किन्तु मुरली की ध्वनि के वशीभूत होकर वे भी दूध नहीं पीते हैं। कोयल, मोर, तोते आदि पक्षी वृक्ष से मूर्च्छित हो-होकर पृथ्वी पर गिर रहे हैं। शिव सनकादिक परमहँसों की आँखों से आनन्द के आँसू नह रहे हैं। 'कृपालु' के शब्दों में अरी सखि! कहाँ तक कहूँ, यमुना जी की स्वाभाविक धारा भी स्थिर हो गयी है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 677-678

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
