मुरली-माधुरी · पद 7
मधुर-धुनि, मुरली बजावत कान्ह।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: madhura-dhuni, muralī bajāvata kānha
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मधुर-धुनि, मुरली बजावत कान्ह।
2धुनि सुनि विधि, हरि, हर सब मोहे, छुट्यो ज्ञानि-जन ध्यान।
3जंगम जीव, भये जड़ सिगरे, जड़ जंगम सुनि तान।
4जो जैसेहिं, तैसेहिं उठि धाई, गोपिन तजि कुल-कान।
5नभ तारागन, चंद्रादिक कहँ, निज-निज गतिहिं भुलान।
6एक"कृपालुहिं"बच्यो जगत महँ, निश्चल शैल समान॥
हिन्दी भावार्थ
श्रीश्यामसुन्दर अत्यन्त ही मीठे स्वर में बंशी बजा रहे हैं, जिसकी ध्वनि सुनकर ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि सभी मुग्ध हो गये एवं ब्रह्मलीन ज्ञानियों के समाधिस्थ ध्यान छूट गये। पशु-पक्षी आदि चलने-फिरने वाले जीव जड़ के समान ठगे-से खड़े रह गये। पिघल-पिघलकर बहने लगे। गोपियों ने भी कुल की मर्यादा खो दी एवं जिस अवस्था में थीं, उसी अवस्था में उठकर भागती हुई श्यामसुन्दर के पास पहुँच गईं। आकाश में स्थित तारागण एवं चन्द्रमा आदि भी अपनी-अपनी गति को भूल गये। समस्त संसार में अकेला मैं ही निश्चल पर्वत की तरह स्थित रहा। मेरे ऊपर मुरली का कोई प्रभाव नहीं पड़ सका।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 677