# मधुर-धुनि, मुरली बजावत कान्ह।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0719-M17-K007
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मुरली-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 7
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 337–337

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मधुर-धुनि, मुरली बजावत कान्ह।  
<a id="line-2"></a>धुनि सुनि विधि, हरि, हर सब मोहे, छुट्यो ज्ञानि-जन ध्यान।  
<a id="line-3"></a>जंगम जीव, भये जड़ सिगरे, जड़ जंगम सुनि तान।  
<a id="line-4"></a>जो जैसेहिं, तैसेहिं उठि धाई, गोपिन तजि कुल-कान।  
<a id="line-5"></a>नभ तारागन, चंद्रादिक कहँ, निज-निज गतिहिं भुलान।  
<a id="line-6"></a>एक"कृपालुहिं"बच्यो जगत महँ, निश्चल शैल समान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्रीश्यामसुन्दर अत्यन्त ही मीठे स्वर में बंशी बजा रहे हैं, जिसकी ध्वनि सुनकर ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि सभी मुग्ध हो गये एवं ब्रह्मलीन ज्ञानियों के समाधिस्थ ध्यान छूट गये। पशु-पक्षी आदि चलने-फिरने वाले जीव जड़ के समान ठगे-से खड़े रह गये। पिघल-पिघलकर बहने लगे। गोपियों ने भी कुल की मर्यादा खो दी एवं जिस अवस्था में थीं, उसी अवस्था में उठकर भागती हुई श्यामसुन्दर के पास पहुँच गईं। आकाश में स्थित तारागण एवं चन्द्रमा आदि भी अपनी-अपनी गति को भूल गये। समस्त संसार में अकेला मैं ही निश्चल पर्वत की तरह स्थित रहा। मेरे ऊपर मुरली का कोई प्रभाव नहीं पड़ सका।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 677

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
