मुरली-माधुरी · पद 6
बँसुरिया, सखि! या लेहु छिनाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: baṁsuriyā, sakhi! yā lehu chhināya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बँसुरिया, सखि! या लेहु छिनाय।
2विष की बुझी छुरी जनु निगुरी, बँसुरी सबै रुवाय।
3ताल, तमाल, रसाल, सालहूँ, नैनन नीर बहाय।
4केकिन, कोकन, शुकन, पिकन लखु, अपलक जल बरसाय।
5कियो मार-रिपु छार मार कहँ, सोऊ दृग झरि लाय।
6सबहिं “कृपालु” जरावति लै कोउ, याऊ देउ जराय॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! इस मुरली को कोई छीन लो। निगोड़ी विष की बुझी छुरी के समान सभी को रुलाती है। ताल, तमाल, रसाल, साल आदि वृक्ष भी मानो पिघल-पिघल कर आँखों से आँसू बहा रहे हैं। कोयल निर्निमेष दृष्टि से निरन्तर आनन्द के आँसू बहा रहे हैं। और कहाँ तक कहें जिन भगवान् शंकर ने अपने त्रिनेत्र को खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया था। भी आँखों से आनन्दाश्रु बहा रहे हैं। पखी कहती है कि अरी सखि! ही है, कोई छीन कर इसको भी जला दो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 676-677