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RADHEY RADHEY

मुरली-माधुरी · पद 5

अरी सखि! क्यों मो पै रिसियाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī sakhi! kyoṁ mo pai risiyāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अरी सखि! क्यों मो पै रिसियाय।

2तुम जो कहति कौन तप कीनो, सो जानत बलभाय।

3इक पग ठाढ़ी तपत विपिन महँ, जीवन दियो बिताय।

4सहत शीत-वर्षा तप निशि-दिन, निज तनु दियो सुखाय।

5अंग अंग कटवाय आपुनो, शूलिहुँ आठ लगाय।

6तब “कृपालु” हरि दियो अधर रस, नहिं अस बात बनाय॥

हिन्दी भावार्थ

मुरली कहती है अरी सखि! तू मुझ पर क्यों रिस करती है। तू जो यह कहती है कि मैंने कौन सा तप किया है तो एक-मात्र श्यामसुन्दर ही जानते हैं। जंगल में एक पैर से खड़ी होकर तपश्चर्या करते-करते अपना सम्पूर्ण जीवन बिता दिया। सर्दी, गर्मी, बरसात सहते-सहते अपना सारा शरीर सुखा दिया। तत्पश्चात् अपने समस्त अंगों को कटवाकर आठ स्थानों से सूली लगवायी। 'कृपालु' के शब्दों में श्यामसुन्दर ने तब जाकर मुझे अधर रस पान कराया है, ऐसे ही बातें बजाने मात्र से यह पद नहीं मिला।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 675-676