मुरली-माधुरी · पद 4
अली! यह, मुरली बैर परी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: alī! yaha, muralī baira parī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अली! यह, मुरली बैर परी।
2हौं तो श्याम-विरह विरहागिनि, आपुहिं जाति जरी।
3पुनि उत जरिहिं जरावति निगुरी, गिरिधर अधर धरी।
4निलज निपट पनघट यमुना तट, डगर बगर पसरी।
5जहँ देखहु तहँ बजति लजति नहिं, नगन देह सबरी।
6लेहु चुराय “कृपालु” याय कोउ, नहिं हौं जात मरी॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! यह मुरली तो मेरे पीछे पड़ गयी है। एक तो मैं ऐसे ही श्यामसुन्दर के वियोग को आग में अपने आप जली जा रही हूँ, दूसरे श्यामसुन्दर के अधर पर विराजमान यह निगोड़ी मुरली और भी जला रही है। यह निर्लज्ज पनघट यमुनातट, डगर, बगर सर्वत्र फैली रहती है। जहाँ देखो नग्न होकर बिना लज्जा के ही बजा करती है। 'कृपालु' के शब्दों में अरी सखि! इसे कोई चुरा लो, नहीं तो मेरा जीवित रहना कठिन है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 675