मुरली-माधुरी · पद 3
अली! यह मुरली बुरी बलाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: alī! yaha muralī burī balāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अली! यह मुरली बुरी बलाय।
2भई बावरी गोपिन डोलति, जनु कोउ मूठि चलाय।
3कोउ धावति, कोउ दृग झरि लावति, कोउ करति मुख"हाय!"।
4लोक-वेद-कुल-कानि-आनि-तिज, गई कोउ बौराय।
5आनन धरे हिरन तृन कानन, नेकु न सकेउ चबाय।
6शुक, सनकादि, शंभु आदिक जे, तेउ समाधि भुलाय।
7बधिर “कृपालु” करत कत अचरज, जो न ठगोरी आय॥
हिन्दी भावार्थ
एक गोपी कहती है कि यह मुरली तो बुरी बला है। इसकी तान सुनकर समस्त ब्रज-गोपियाँ दीवानी-सी बनकर डोलती हैं। जैसे किसी ने इन पर जादू कर दिया हो। कोई गोपी भागती है, कोई घर से न निकल सकने के कारण आँसू बहाती है एवं कोई मुरली की तान सुनते ही अपने मुख से हाय! हाय!। कहती है। कोई तो लोक परलोक का ध्यान छोड़कर वास्तव में ही पागल हो जाती है। वन में मृग अपने मुख में घास रख कर न तो उसे चबा ही सकते हैं और न उगल ही सकते हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी शुकदेव, सनकादिक एवं शंकरादिक भी अपनी-अपनी समाधि भूल गये। 'कृपालु' कहते हैं कि तू बहरा होने के कारण यह आश्चर्य मत कर कि मैं तो मुरली की ठगाई में नहीं आया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 674