मुरली-माधुरी · पद 2
अली मोरी, मुरली कौन लई?।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: alī! morī, muralī kauna laī?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अली मोरी, मुरली कौन लई?।
2मुरली बिनु मोहिं चैन न इक छिन, सो मम प्राणमई।
3एक कहे"मैं सुनी कालि कोउ, भार मे डार दई"।
4एक कहे"देखी मैं कतहूँ, सुधि नहिं भूलि गई"।
5एक कहे तारी दै हँसि हँसि,"यह तो भली भई"।
6सुनि-सुनि वचन सखिन हरि खीझत, दृगन घटा उनई।
7कहति “कृपालु” मातु"कत रोवत, देउँ मँगाय नई"॥
हिन्दी भावार्थ
(श्रीकृष्ण की मुरली किसी गोपी ने चुरा ली है एवं श्रीकृष्ण मुरली के लिए व्याकुल होकर सबसे पूछ रहे हैं।) अरी सखी! मेरी मुरली किसने चुरा ली है? मुरली बिना मुझे एक पल भी अच्छा नहीं लगता। वह मुरली मुझे प्राणों के समान प्यारी है। एक गोपी कहती है कि मैंने तो सुना है वि कल किसी ने मुरली को भाड़ में डालकर जला दिया। (क्योंकि मुरली से गोपियों की विरहाग्नि बढ़कर उन्हें जलाया करती थी।) दूसरी गोपी ने कहा कि मैंने सुना ही नहीं वरन् कहीं देखा है (कुछ देर सोचती हुई), किन्तु अब याद नहीं कि कहां देखा है, मैं तो भूल गई। तीसरी चंचल गोपी ताली बजाकर बार-बार हँसती हुई कहती है कि यह तो बहुत ही अच्छा हुआ (क्योंकि यह मुरली समस्त गोपांगनाओं को तंग करती थी) गोपियों के इन उपहास भरे व्यंग्य वचनों को सुनकर श्रीकृष्ण और भी खीझ गये तथा उनके नेत्रों में आँसू भर गये। 'कृपालु म हैं कि यह बातें मैया भी सुन रही थीं, अतएव मैया ने कहा, मेरे लाल! तुम मुरली के लिए क्यों रोते हो?? मैं तुम्हें नई मुरली मंगा दूँगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 673-674