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RADHEY RADHEY

मुरली-माधुरी · पद 1

अलि! मुरली के बड़ भाग रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ali! muralī ke bad̤a bhāga re

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अलि! मुरली के बड़ भाग रे।

2याने जाने कौन कियो तप, नित मोहन-मुख लाग रे।

3निधरक पियत अधर-रस निशि-दिन, सरस प्रेम रस पाग रे।

4कबहुँक कर, कबहुँक उर हरि तेहि, इक छिन कहँ नहिं त्याग रे।

5शुक सनकादि शंभु से योगिहुँ, याय करत अनुराग रे।

6कह “कृपालु” यह लोकहिं, वेदहिं, कुलहिं लगावति दाग रे॥

हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! मुरली के बड़े भाग्य हैं। इसने न जाने कौन सी तपश्चर्या की है जो निरन्तर श्यामसुन्दर के मुँह लगी रहती है। यह श्यामसुन्दर के प्रेम में पगी हुई बेधड़क दिन-रात उनके अधर सुधा रस का पान करती रहती है। इसके अतिरिक्त भी कभी श्यामसुन्दर के हाथ में विराजमान रहती है, कभी श्यामसुन्दर उसे हृदय से लगाये रहते हैं। तात्पर्य यह कि उसे एक क्षण को भी नहीं छोड्ते। और कहाँ तक कहें शुक सनकादिक परमहँस एवं भगवान् शंकर सरीखे योगीश्वर भी ठ पीछे दीवाने हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह कुल की मर्यादाओं में भी कलंक लगाती है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 672-673