मान-माधुरी · पद 59
कुंवरि! तुम, मेरी जीवन-मूरि।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari! tuma, merī jīvana-mūri
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कुंवरि! तुम, मेरी जीवन-मूरि।
2तुम्हरे रास हेतु नित धारत, तव दासिन-पग-धूरि।
3किंकर जानि सनातन अपनो, कबहुँ न करियो दूरि।
4हौं अवगुन-सागर, तुम नागरि, गुन-आगरि भरपूरि।
5याते कबहुँ न मान ठानियो, रिस जनि करियो भूरि।
6लली “कृपालु” लगाय कंठ कह,"तुम सुहाग हम चूरि"॥
हिन्दी भावार्थ
(मान के बाद मिलन की अवस्था में लाल जी का लाडली जी से लाइपूर्वक कथन।) हे किशोरी जी! तुम मुझे जीवन प्रदान करने वाली हो। तुम्हारे दर्शन के लिए ही मैं सदा तुम्हारी दासियों की चरण धूलि अपने मस्तक पर लगाया करता हूँ। अतएव तुम मुझे अपना सनातन-दास समझकर कभी भी अपने से दूर न करना। में तो अवगुणों का भण्डार हूँ, सदा ही भूल करता रहुँगा, किंतु तुम तो गुणों की भण्डार हो अतएव मुझे अपना समझकर मेरे अपराधों पर ध्यान न देते हुए कभी भी इस प्रकार का अत्यन्त क्रोधपूर्वक मान मत ठानना। 'कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी प्रियतम को गले लगाकर कहती हैं, "ऐसा मत कहो, तुम तो हमारे सुहाग हो और मैं उससे नित्य सम्बन्ध रखने वाली चूड़ी हूँ।'(लोक में सुहाग एवं चूड़ी का धर्मानुसार नित्य सम्बन्ध रहता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 671