# कुंवरि! तुम, मेरी जीवन-मूरि।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0712-M16-K059
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: मान-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 59
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 334–334

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कुंवरि! तुम, मेरी जीवन-मूरि।  
<a id="line-2"></a>तुम्हरे रास हेतु नित धारत, तव दासिन-पग-धूरि।  
<a id="line-3"></a>किंकर जानि सनातन अपनो, कबहुँ न करियो दूरि।  
<a id="line-4"></a>हौं अवगुन-सागर, तुम नागरि, गुन-आगरि भरपूरि।  
<a id="line-5"></a>याते कबहुँ न मान ठानियो, रिस जनि करियो भूरि।  
<a id="line-6"></a>लली “कृपालु” लगाय कंठ कह,"तुम सुहाग हम चूरि"॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(मान के बाद मिलन की अवस्था में लाल जी का लाडली जी से लाइपूर्वक कथन।) हे किशोरी जी! तुम मुझे जीवन प्रदान करने वाली हो। तुम्हारे दर्शन के लिए ही मैं सदा तुम्हारी दासियों की चरण धूलि अपने मस्तक पर लगाया करता हूँ। अतएव तुम मुझे अपना सनातन-दास समझकर कभी भी अपने से दूर न करना। में तो अवगुणों का भण्डार हूँ, सदा ही भूल करता रहुँगा, किंतु तुम तो गुणों की भण्डार हो अतएव मुझे अपना समझकर मेरे अपराधों पर ध्यान न देते हुए कभी भी इस प्रकार का अत्यन्त क्रोधपूर्वक मान मत ठानना। 'कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी प्रियतम को गले लगाकर कहती हैं, "ऐसा मत कहो, तुम तो हमारे सुहाग हो और मैं उससे नित्य सम्बन्ध रखने वाली चूड़ी हूँ।'(लोक में सुहाग एवं चूड़ी का धर्मानुसार नित्य सम्बन्ध रहता है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 671

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
