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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 58

श्री राधे रानी! केहि विधि तोहिं समुझाऊँ।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shrī rādhe rānī! kehi vidhi tohiṁ samujhāūṁ

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1श्री राधे रानी! केहि विधि तोहिं समुझाऊँ।

2भृकुटि-विलासहिं जियत मरत नित, तुम ते कहा दुराऊँ।

3तुम मम गति, पुनि तोहिं तजि मानिनि! कहहु कहाँ हौं जाऊँ।

4तुम मम मन, मन बिनु मनमोहिनि, किमि पलहूँ कल पाऊँ।

5तुम मम प्रान, प्रान बिनु इक छिन, कैसेहुँ रहि न सकाऊँ।

6तुम “कृपालु” मम सरवस, स्वामिनि!, देहु कमल-पद ठाऊँ॥

हिन्दी भावार्थ

(मान के बाद मिलन को अवस्था में प्रियतम का प्यारीजी से कहना।) हे किशोरी जी! मैं तुम्हें किस प्रकार समझाऊँ। तुम्हारी ही भौंहों के सीधे एवं टेढ़े होने पर मैं जीता अथवा मरता रहता हूँ! यह बात तुमसे भी छिपी नहीं है। तुम ही मेरी गति हो, फिर भला तुम को छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ? तुम मेरा मन हो। हे मनमोहिनी राधे! मैं किस प्रकार चैन पा सकता हूँ? तुम ही मेरी प्राण हो प्राण के बिना भला एक क्षण भी मैं कैसे जीवित रह सकता हूँ। कृपालु' कहते हैं कि हे स्वामिनी जी! तुम हमारी सर्वस्व अतएव अपने चरण कमलों में मुझे सदा के लिए स्थान दिये रहना। तात्पर्य यह कि अब कभी मान मत करना।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 670-671