मान-माधुरी · पद 57
श्री राधे रानी! अब जनि करियो मान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shrī rādhe rānī! aba jani kariyo māna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्री राधे रानी! अब जनि करियो मान।
2जाको जात नात जुरि जासों, जाने या अनजान।
3ताको गुन-अवगुन सो सपनेहुँ, धरत न कबहूँ ध्यान।
4पुनि तू तो पी की हूँ नीकी, ही की गति पहिचान।
5हौं तुम बिनु इक छिन नहिं रहि सक, ज्यों नहिं तनु बिनु प्रान।
6तुम “कृपालु” भल प्रीति रीति कहँ, जानति बनति अयान॥
हिन्दी भावार्थ
(मान के पश्चात् मिलन की अवस्था में किशोरी जी से प्रियतम के लाड़-भरे वचन।) हे किशोरी जी! अब तुम कभी मान मत करना। देखो किशोरी जी! जानकर या बिना जाने भी जिसका जिससे नाता जुड़ जाता है, वह अपने प्रियतम के गुण अथवा अवगुण स्वप्न में भी नहीं देखता। फिर तुम तो अपने प्रियतम के हृदय की वास्तविक अवस्था से भी परिचित हो कि जिस प्रकार बिना प्राण के शरीर नहीं रह सकता, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकता। 'कृपालु' कहते हैं कि तुम यद्यपि भली-भाँति प्रीत की इन सब बातों को जानती हो, फिर भी जान-जानकर अनजान बनती हो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 669-670