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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 56

श्री राधे रानी! जाके लगे सोइ जान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shrī rādhe rānī! jāke lage soi jāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1श्री राधे रानी! जाके लगे सोइ जान।

2तुम तो भरी गुमानन मानन, ठानति करि अभिमान।

3तुम बिनु, मनि बिनु फनि जनु छिन-छिन, तलफत पल-पल प्रान।

4घेरत विरह, हारि तोहिं हेरत, टेरत कुंज-लतान।

5अबहूँ भान न रहत प्रान कहँ, करत मान को ध्यान।

6उत “कृपालु” हाँसी इत फाँसी, का सीखी अस बान॥

हिन्दी भावार्थ

(किशोरी जी के मान-भंग के पश्चात् श्यामसुन्दर का उनसे घुल-मिलकर बातें करना।) हे किशोरी जी! जिसको विरह दुःख मिलता है उसी को इसका अनुभव होता है, दूसरा क्या जाने। तुम तो मान के गर्व में रूठ जाती हो किन्तु मैं तुम्हारे बिना उसी प्रकार पल-पल तड्पता हूँ जिस प्रकार मणि के बिना सर्प तड़पता है। हे किशोरी जी! जब बिरह मेरे ऊपर आक्रमण करता है और मैं हार जाता हूँ, तब तुम्हारी ही शरण लेता हुआ तुम्हें प्रत्येक लता-कुंजों में पुकारा करता हूँ। हे किशोरी जी! इस समय भी जब मैं गत मान का ध्यान करता हूँ तब मेरे प्राण निकलने से लगते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि तुम्हारी तो उधर हँसी होती है किन्तु इधर मेरे प्राणों पर आ बीतती है। ऐसी बुरी मान की बान तुमने क्यों सीखी है? तात्पर्य यह है कि अब कभी मान मत करना।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 668-669