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RADHEY RADHEY

मान-माधुरी · पद 55

श्री राधेरानी!, लागी बुरी बलाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shrī rādhe rānī!, lāgī burī balāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1श्री राधेरानी!, लागी बुरी बलाय।

2बारेक लाग आग अनुरागहिं, फेरि न बुझे बुझाय।

3छिन छिन बढ़त जाति विरहागिनि, तन, मन, प्रान जराय।

4अनुरागिन कहँ मान विषागिनि, नागिनि-सी बनि खाय।

5मानहिं करन जान तुम मानिनि, कबहूँ देखु मनाय।

6सो “कृपालु” किमि जान पीर जेहि, पग नहिं फटी बिवाय॥

हिन्दी भावार्थ

(किशोरी जी के मान भंग होने के बाद श्री श्यामसुन्दर लाड़िली जी से अत्यन्त ही लाड़ भरे शब्दों में कहते हैं।) हे किशोरी जी। किसी से लगन लग जाना यह बहुत ही बुरा रोग है। क्योंकि एक बार भी प्रेम की आग लग जाने पर फिर करोड़ों उपायों से भी वह आग नहीं बुझ सकती, वरन् क्षण क्षण में वह विरहाग्नि तन, मन एवं प्राणों को जलाती हुई बढ़ती ही जाती है। प्रेमियों के लिए मान-रूपी विष की अग्नि नागिन-सी बनकर विष फैलाती है। हे किशोरी जी! तुम केबल मान ही करना जानती हो, कभी मनाकर भी तो देखो, तब तुम्हें स्वयं अनुभव हो जायगा कि मान करना कितना बुरा है। कृपालु'अपने संसार की नियमावली के अनुसार कहते हैं जिसके पैर न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 668